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शनिवार, 26 मार्च 2011

ek din aur yun hi guzar gaya...

आज फिर अलस्सुबह जाग गया. जैसे मेरी दिनचर्या रोज़ शुरू होती है बस वैसे ही. कल इन्स्तामेत स्टोर मशीन ठीक करवा रहा था तो याद आया कि; पौड़ी जाकर बंदोबस्ती ऑफिस से सन साठ की खतौनी निकलवानी  है! सुबह  यामाहा ऍफ़-जेड १६ में पेट्रोल (५०० रु.का) डलवाया. सतपुली से वाया बांघाट-कांसखेत पौड़ी पहुंचा और लगभग ४ बजे वापस चला. रास्ते में पूरा जंगल (पौड़ी से कांसखेत तक) "बुरांश" के लाल दहक़ते फूलों से भरा पड़ा था. 
लगता था कि 'हरियाली पर लाली' भारी पडी है. बहुत ही पुर सुकून नज़ारा चारों ओर बिखरा पड़ा था. खूब विडियो ग्राफी की. हाँ! सुबह जाते हुए जंगलात के कुछ लोगों को जंगल में आग लगाते देखा था, वो आग अब भयानक रूप ले चुकी थी और जंगलात वाले नदारद थे. अगर कुछ था तो सिर्फ सब कुछ लील जाने को आतुर चटर-पटर करती  आग की लपलपाती हुई लाल-लाल लपटें, अँधेरा और......दूऊऊर तक पसरा सन्नाटा.  छोटा सा विडियो बना डाला, विभाग को दिखने दे लिए. वन-विभाग गाँव के सीधे लोगों को फंसा देता है. एक तीर से कई शिकार.....चोरी से कटवा दिए गए पेड़ों के ठूंठ जल कर सुबूत ख़त्म.............कागज़ो में किये वनीकरण /पौध को आग में जला दिखाकर करोड़ों के वारे-न्यारे..वाह रे जंगलात वालों .........फाएर सीज़न में सूखे पत्ते जलाने, पानी की लाइन बिछाने, फायर लाइन  के लिए आये धन का भी हिसाब साफ................अब बारी आग बुझाने के लिए आई राशि को ठिकाने लगाने की..................... फिर सुबह होगी फिर नई पौध लगाने, आग बुझाने वगैहरा का पैसा आएगा ...............जंगलों को आग से बचाने को राहगीरों को जलती बीडी, तिल्ली जंगल में न फेकने की हिदायत करते बोर्ड लगेगे, ट्रेनिंग होगी, गोष्ठी होगी...... पैसा आएगा ......रेंजर साहब की बीबी को इस बार अपनी पड़ोसन की गाड़ी से कीमती गाड़ी लेनी है.........बनारसी साडी लेनी है......रोकी को २०० सीसी की बाईक लेनी है............ सबकी उम्मीदें फायर सीज़न से बन्ध्ही हैं.......कुछ हिस्सा वापस भी जाना है खबर आई है.                                                               
             

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