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मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

Kya Priy-Pad-raj..Kanchan ho sakti hai?
labon par hansee,  aankhe ro sakti hai..


ye Shrishti ka hai saty - niyam purana..
jisne janm liya usko hai nischit hi jana..
tum bhawon ka sparsh anokha deti ho
dhara, dharitri ho..tum uski priy beti ho.


shila khand pe likha hua bhi amit na hota
vakya-arth ya geet-shabd pe naad hai rota


Smritiyan to mastishk-patal par ankit hokar
pushp - paragan sam teri padraj dhokar ...    Ramesh                                                                    Ghildiyal

सोमवार, 19 मार्च 2012

मै अकेले  ..
बैठा  हूँ  ..निर्विकार  औ  रीता  सा
प्रकाश  उर्जित  करता  मुझको ,
 दुःख  लगता  अब  बीता  सा ...

 छुपे  हुए  मेरे  एह्सास ,
 मेरे  मनोभाव  निराश !
जिन्दा  रहने  को  शंघर्ष  जरुरी  है
 मेरे सपनो  को  कुचल रही  ये  दुनिया ,
 इससे  पार,  हर  बार,  प्यार  जरुरी  है .
 मै अपने होने का एहसास कराना चाहता हूँ
 जिन्दा था उनकी  यादों में,  रहना चाहता हूँ .

मंगलवार, 13 मार्च 2012

ये सूरज भी तेरा है ये चंदा भी तेरा है
तेरी ही गलियों में खुशियों का बसेरा है!!

जिनकी तकदीर में तड़प लिक्खी है विधाता ने,
वो दोस्त भी तेरा है दुश्मन भी तेरा है !!

तेरे गुलाबी गालों तक न पहुंचे ये तपिश ,
हाथों में थमा ये शोला, सुख सुनेहरा है !!
कोई यूँ ही न चुरा ले तुमको हमसे ए सखी,
तेरे दर-ओ- दीवार पे निगाहों का पहरा है !!

तुम्हे पाने को बेताब रहता है जो अक्सर,
किसी की जागीर नहीं, छोटा सा घर मेरा है !!

बबूल ही सही, कोई तो पूछे ए नमकपाश!
ये वो पेड़ है जिसपे नन्ही चिड़ियों का बसेरा है!!

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

देने वाले ने क्या-क्या न दे डाला बन्दे को?
लेने वाले गुजर गए तब आँखों के अंधे हो.....
उसने तो खाली हाथों सब को भेजा दुनिया में
नाकारा तो कोस रहे है,कर्मठ करते धंदे सौ .... RAmesh Ghildiyal

रविवार, 18 दिसंबर 2011

जो गुजर गया उसे भूल जा,  जो मिल गया उसे चूम ले!
शाम सुहानी अब हो चली, लग जा गले,   आ झूम ले .....

 दर्द सभी तो पाले हैं, गहरे दिल के छाले हैं
 बहारें फिर से लौटी हैं, आ चमन में संग घूम ले ....

  जख्मों औ आहों का दोस्त! बड़ा ही लम्बा खाता है...
  अपनी भी किस्मत का देखो! ग़म से गहरा नाता है...

 दीवारों पर खिची लकीरें, कोई जरूर मिटाता है
  पर दिल के जख्मो को तो, बिरला ही भर पाता है

 घृणा, द्वेष औ चालाकी तो दुनियावी ताबीरें हैं
 आदर, अनुराग, प्रेम-प्यार कुदरत की जागीरें हैं..

 अपनों को ही ठग पाते हैं ये दुनिया वाले, दोस्त सुनो!
सोचो-समझो,विचार करो, तब जाकर एक दोस्त  चुनो ....


अपने उर में जो ज्वालाओ को पाल रहे हैं दोस्त सुनो
 नफरत औ गुस्से को घर में वो ढाल रहे हैं दोस्त सुनो!                 रमेश घिल्डियाल 

बुधवार, 23 नवंबर 2011


tere sundartam bhawon ko
mai apne shabd samarpit karta hun..
sach mano!
aye dost mere teri manuhaaron ko
main aadi au prarabdh samarpit karta hun...


tum mere dil ki dhadkan ban baithi ho
tum kya jaano mere naino me bas tum rahti ho.
tumhari bholi si aankho me meri kavita ka ghar hai...
 tere ansu kabhi n aaye..vrna dhul jaane ka dar hai....Ramesh Ghildiyal...
kaise tere wishwaason ko poora kar paaunga?
kya raadhe! man ki peer teri mai har paaunga?